हरे रामा
कबहुँ कि दुख सब कर हित ताकें
तेहि कि दरिद्र परस मनि जाकें
परद्रोही की होहिं निसंका
कामी पुनि कि रहहिं अकलंका
बंस कि रह द्विज अनहित कीन्हें
कर्म कि होहिं स्वरूपहि चीन्हें
काहू सुमति कि खल सँग जामी
सुभ गति पाव कि परत्रिय गामी
भव कि परहिं परमात्मा बिंदक
सुखी कि होहिं कबहुँ हरिनिंदक
राजु कि रहइ नीति बिनु जानें
अघ कि रहहिं हरिचरित बखानें
पावन जस कि पुन्य बिनु होई
बिनु अघ अजस कि पावइ कोई
लाभु कि किछु हरि भगति समाना
जेहि गावहिं श्रुति संत पुराना
हानि कि जग एहि सम किछु भाई
भजिअ न रामहि नर तनु पाई
जय श्री राम
कबहुँ कि दुख सब कर हित ताकें
तेहि कि दरिद्र परस मनि जाकें
परद्रोही की होहिं निसंका
कामी पुनि कि रहहिं अकलंका
बंस कि रह द्विज अनहित कीन्हें
कर्म कि होहिं स्वरूपहि चीन्हें
काहू सुमति कि खल सँग जामी
सुभ गति पाव कि परत्रिय गामी
भव कि परहिं परमात्मा बिंदक
सुखी कि होहिं कबहुँ हरिनिंदक
राजु कि रहइ नीति बिनु जानें
अघ कि रहहिं हरिचरित बखानें
पावन जस कि पुन्य बिनु होई
बिनु अघ अजस कि पावइ कोई
लाभु कि किछु हरि भगति समाना
जेहि गावहिं श्रुति संत पुराना
हानि कि जग एहि सम किछु भाई
भजिअ न रामहि नर तनु पाई
जय श्री राम
