हरे कृष्णा
जीवन का केंद्र बिंदु आकषर्ण है और यह आकषर्ण माया का केंद्र है
सारा संसार किसी न किसी आकषर्ण के वशीभूत गतिशील है
नारी का पुरुष में आकर्षण व् पुरुष का नारी के प्रति मोह यही जीवन की एक धारा है
पर वस्तुत दोनों ही किसी न किसी रूप में सफलता जो स्वयं की परिपूर्णता में निहित है उसको निज आकर्षण में खोजने का प्रयास करते है
यदि मैथुन ही जीवन का ध्येयः होता तो सभी जीव स्वतः ही शीघ्रः मुक्त हो जाते पर सत्य इस भौतिक सत्य से भिन्न है जो स्वयं में विधमान तो है पर दर्श नहीं
उसी सत्य की खोज जीव को परिपूर्ण कर उसे माया के पाश से मुक्त कर सकती है
जय श्री कृष्णा
जीवन का केंद्र बिंदु आकषर्ण है और यह आकषर्ण माया का केंद्र है
सारा संसार किसी न किसी आकषर्ण के वशीभूत गतिशील है
नारी का पुरुष में आकर्षण व् पुरुष का नारी के प्रति मोह यही जीवन की एक धारा है
पर वस्तुत दोनों ही किसी न किसी रूप में सफलता जो स्वयं की परिपूर्णता में निहित है उसको निज आकर्षण में खोजने का प्रयास करते है
यदि मैथुन ही जीवन का ध्येयः होता तो सभी जीव स्वतः ही शीघ्रः मुक्त हो जाते पर सत्य इस भौतिक सत्य से भिन्न है जो स्वयं में विधमान तो है पर दर्श नहीं
उसी सत्य की खोज जीव को परिपूर्ण कर उसे माया के पाश से मुक्त कर सकती है
जय श्री कृष्णा
