हरे रामा
तारा बिकल देखि रघुराया
दीन्ह ग्यान हरि लीन्ही माया
छिति जल पावक गगन समीरा
पंच रचित अति अधम सरीरा
प्रगट सो तनु तव आगें सोवा
जीव नित्य केहि लगि तुम्ह रोवा
उपजा ग्यान चरन तब लागी
लीन्हेसि परम भगति बर मागी
उमा दारु जोषित की नाई
सबहि नचावत रामु गोसाई
जय श्री राम
तारा बिकल देखि रघुराया
दीन्ह ग्यान हरि लीन्ही माया
छिति जल पावक गगन समीरा
पंच रचित अति अधम सरीरा
प्रगट सो तनु तव आगें सोवा
जीव नित्य केहि लगि तुम्ह रोवा
उपजा ग्यान चरन तब लागी
लीन्हेसि परम भगति बर मागी
उमा दारु जोषित की नाई
सबहि नचावत रामु गोसाई
जय श्री राम
